जय मिथिला

मिथिलाक लिपि, इतिहास, कला एवं संस्कृति पर शोधपूर्ण विमर्श

Hanumanji

हनुमानजी को कैसे मूँज का जनेऊ पहना दिया गया?

रामकथारूपी माला के सुमेरु रत्न के समान महावीर हनुमान् जी की जाति का उल्लेख करना भी पाप है। हनुमान् रुद्र के अवतार है। भगवान् शंकर ने स्वयं विष्णु से कहा था कि जब आप रावण का संहार करने के लिए धराधाम पर अवतीर्ण होंगे तब मैं आपकी सहायता के लिए साथ रहूँगा।

हनुमान् जी सभी गुणों के आगार हैं, वे अमित बलशाली, शत्रुओं को परास्त करनेवाले तथा बुद्धिमानों में अग्रगण्य हैं। उन्हें जाति की सीमा में बाँधना उचित नहीं है। वाल्मीकि रामायण में उनका परिचय इस प्रकार दिया गया है-

यस्याहं हरिणः क्षेत्रे जातो वातेन मैथिलि।
हनूमानिति विख्यातो लोको स्वेनैव कर्मणा।।
(सुन्दरकाण्ड, 35, 83)

रावण को अपना परिचय देते हुए उन्होंने यह गर्वोक्ति की-

दासोऽहं कोसलेन्द्रस्य रामस्याक्लिष्टकर्मणः।
हनुमान् शत्रुसैन्यानां निहन्ता मारुतात्मजः।।
(सुन्दरकाण्ड)

हनुमानजी अंजना के पुत्र हैं।

हनुमानञ्जनीसूनुर्वायुपुत्रो महाबल:। 
रामेष्ट: फाल्गुनसख: पिङ्गाक्षोऽमितविक्रम:।।
उदधिक्रमणश्चैव सीताशोकविनाशन:।
लक्ष्मणप्राणदाता च दशग्रीवस्य दर्पहा।।
एवं द्वादश नामानि कपीन्द्रस्य महात्मन:।
स्वापकाले प्रबोधे च यात्राकाले च य: पठेत्।।
तस्य सर्वभयं नास्ति रणे च विजयी भेवत्।
राजद्वारे गह्वरे च भयं नास्ति कदाचन।।

तुलसीदास के नाम पर जिस हनुमान-चालीसा का पाठ वर्तमान में सबसे अधिक किया जाता रहा है उसमें एक पंक्ति में पाठ-भेद हो जाने के कारण अर्थ का इतना अनर्थ हो गया है कि उसका अनुकरण कर लोग अपनी मौलिक परम्परा को बिगाड लेने पर तुले हुए हैं।
हनुमानचालीसा मे एक स्थान पर पाठ आया है- काँधे मूँज जनेऊ साजै। Read more>>

मुख्य आलेख
Sarasvati-puja

मैथिल साम्प्रदायिक सरस्वती-पूजा पद्धति

मिथिलामे तान्त्रिक विधि-विधानसँ कर्मकाण्ड होइत अछि। सरस्वती-पूजाक पद्धति महाराजाधिराज रमेश्वर सिंहक उपयोग करबाक लेल गंगौली गामक म.म. जगद्धर झा पद्धति बनौने रहथि। संगहि लोहना गामक प. रमाकान्त ठाकुर सेहो महाराजाधिराज रमेश्वर सिंहक आज्ञासँ पौरोहित्यकर्मसारक रचना कएल। ओहिमे सरस्वती-पूजाक विस्तृत पद्धति देल अछि>>

 

dipavali

दीपावली का माहात्म्य

दीपावली सम्पूर्ण भारतवर्ष में श्रद्धा एवं विश्वास के साथ मनाया जानेवाला प्रमुख पर्व है। इस दिन के साथ कई कथाएँ एवं ऐतिहासिक घटनाएं जुडी हुई है।

Ulka in Dipavali

मिथिलामे दीपावलीक राति ऊक फेरबाक परम्परा

तीन प्रकारक जे रात्रि कालरात्रि, महारात्रि आ मोहरात्रि कहल गेल अछि ताहि में पहिल कालरात्रि दीपावली थिक। मिथिलामे ई गृहस्थक लेल महत्त्वपूर्ण अछि। आई जखनि बहुत मैथिल बन्धु बाहर रहैत छथि, बहुतो गोटे परम्परा सँ अनभिज्ञ छथि तखनि हुनका लोकनिक लेल एतए हम मिथिलाक परम्पराक उल्लेख करैत छी। परदेसमे एकर निर्वाह तँ कठिन अछि मुदा जानकारी अधलाह नहिं। बहुत विधि छैक जे कएल जा सकैत अछि।

manuscript
A Text From Rudrayamala as the Source of the History of Mithila

I have a manuscript dealing with the history of Mithila. I have found it in scattered position with some another old papers and a manuscript in Devanagari, beside the road at Ladora village near Kalyanpur block headquarters in Samastipur district in 2013 while I was on the way to Ajit Kumar Mehta Sanskrit Shikshan Samsthan, a Sanskrit college affiliated to Rastriya Sanskrit Sansthan, Delhi. >>

 

सामा-चकेबाक कथा

सामा-चकेबाक सम्पूर्ण कथा कतहु ने तँ पुराण मे भेटैत अछि आ ने लोककथे मे। एकर मूलस्रोत भविष्य-पुराणक सूर्योपासनाक प्रसंग में अछि, मुदा मिथिलामें प्रचलित बहुत रास विधिक आलोकमे ओकर व्याख्या नहिं भए पबैत छैक, तें बुझाइत अछि जे कतहु ने कतहु ओ अंश छुटल अछि जे पारम्परिक विधि-विधानकें कथाक संग जोडैत हो। >>

Dhanvantari
धन्वन्तरि-जयन्ती या धनतेसर?

समुद्र-मन्थन के क्रम में दीपावली से एक दिन पूर्व अमृत कलश के साथ भगवान् धन्वन्तरि महाराज उत्पन्न हुए थे। वे शारीरिक रोगों का निवारण करनेवाले देवता माने गये हैं। इस दिन उनकी जयन्ती की परम्परा भारत में प्रचलित है। आज बाजारवाद ने संचारमाध्यमों के द्वारा इसे खरीद-बिक्री का दिन बना दिया है और उसे धन के साथ जोड़ दिया है >>