जय मिथिला

मिथिलाक लिपि, इतिहास, कला एवं संस्कृति पर शोधपूर्ण विमर्श

मिथिलाक चौरचन पूजाक इतिहास

चौठचन्द्र मिथिलाक विशिष्ट पर्व थीक जे आनठाम कतहु नहिं होइत अछि। एहिमे पकमान आ दहीक विशेष महत्त्व अछि। सन्तानक उन्नतिक कामनासँ चन्द्रमाक आराधना एहि दिन कएल जाइत अछि। मिथिलामे प्रख्यात ज्योतिषी हेमाङ्गद ठाकुर ई पूजा आरम्भ कएल से साक्ष्य सभसँ सिद्ध होइत अछि। एकर विवरण नीचाँ देल गेल अछि।

ई चौठचन्द्र पूजा सन्ध्याकालिक चतुर्थी तिथिमे होइत अछि। जाहि सन्ध्यामे चतुर्थीक चन्द्रमा उदय हो ताहिमे पूजा करबाक चाही। जँ दूनू दिन चन्द्रोदय कालमे चतुर्थी तिथि पड़ए तँ दोसर दिन पूजा होएबाक चाही। पूजा पुरुष अथवा महिला दूनू करैत छथि। भरि दिन व्रत कए सन्ध्यामे पूजा करी।


चतुर्थीचन्द्र पूजा निर्णय विधि एवं कथा

मिथिलामे चौठचन्द्रक सम्बन्धमे चण्डेश्वरक (14म शती) कृत्यरत्नाकरमे सेहो उल्लेख भेटैत अछि। ओतए ई कहल गेल अछि जे भाद्र शुक्ल चतुर्थीक चन्द्रमाक दर्शन कएला सँ मिथ्या कलंक लगैत अछि तें ओहि दिन चन्द्रमाक दर्शन नहिं करी। एहि पंक्तिक मूल ओ नहिं कहि एकरा शिष्टवचनक रूपमे लिखैत छथि। संगहि ब्रह्मपुराणक कथा सेहो उद्धृत करैत छथि जे एही राति स्वयं नारायण पर सेहो एही चन्द्रमाक इजोरियामे कलंक लागल रहनि तें ओ कलंक मनुष्यो कें लागत। तें धोखा सँ जँ चन्द्रमाक दर्शन भए जाए तँ ई धात्रेयिका वाक्य पूव मुँहें अथवा उत्तर मुँहें ठाढ़ भए पढी़। ई धात्रेयिका वाक्य विष्णुपुराण सँ उद्धृत करैत छथि- सिंहः प्रसेनमवधीत् इत्यादि।
कृत्यरत्नाकरक एहि अंशसँ स्पष्ट नहिं होइत अछि जे चौठचन्द्रक वर्तमान स्वरूप कहियासँ प्रारम्भ भेल। एहि सम्बन्धमे मुकुन्द झा बख्शीक मिथिलाभाषामय इतिहास कें उद्धृत करैत पर्वनिर्णयक सम्पादक कुशेश्वर शर्मा एकर प्रचारक तिथि निर्धारित करैत छथि जे-
मिथिलाराज्योपार्जकबुधवरठक्कुरमहेशसूनुः।
करविगणनातिकालाद् दिल्लीकारागृहे रुद्धः।।
हेमाङ्गदो नरेशो ज्यौतिषशास्त्राब्धिपारगो विद्वान्।
राहूपरागपञ्जीं कृत्वा तत्रालिखत् कुड्ये।।
अनुपदमेतं सम्राडकबर आदृत्य विससर्ज।
राज्ञाऽऽगतेन देशे प्रवर्तिता नभस्यसिततुर्येन्दोः।
कुगजग्रह(981) यवनाब्दात् दिल्ल्यामङ्गीकृता पूजा।।
अर्थात् मिथिला राज्यक उपार्जक महेश ठाकुरक बेटा समय पर कर नहिं देबाक कारणें दिल्लीक कारागारमे बन्द कएल गेलाह। ओ ज्योतिष शास्त्रक उद्भट विद्वान् राजा हेमाङ्गद ठाकुर रहथि। ओ ओहि कारागारक दिवाल पर ग्रहणक तालिका (ग्रहणमाला नामसँ प्रकाशित ग्रऩ्थ) बनाए लिखलनि। एकर परिणामस्वरूप सम्राट् अकबर हुनका आदरपूर्वक छोडि़ देलकनि। ओ राजा जखनि अपन घर घुरलाह तँ भाद्र शुक्लक चतुर्थी तिथि कें चन्द्रमाक पूजा प्रारम्भ कएलनि। 981 हिजरीमे ओ दिल्लीमे ई पूजा कएने रहथि।
981 हिजरीक भादव मासक समय 1573 ई.मे पडै़त अछि। तें एहि आधार पर मिथिलामे 1573 ई. सँ ई पूजा आरम्भ भेल होएत।


पूजाक दिनक निर्णय

म.म. अमृतनाथक कृत्यसारसमुच्चयमे एकर वर्तमान रूपक उल्लेख नहिं भेटैत अछि। मुदा एकर सम्पादक पं. गङ्गाधर मिश्र टिप्पणी मे एकर उल्लेख करैत छथि-
कृत्यसारसमुच्चयक संगत पृष्ठ पर्वनिर्णय मे पृष्ठ संख्या 70 पर पण्डित जीवनाथ (राय) शर्माक लिखल चतुर्थीचन्द्रादर्शनम् शीर्षकसँ एकटा निबन्ध अछि, जाहिमे विस्तृत रूपसँ एहि पर्वक तिथि निर्णय देल गेल अछि। ई जीवनाथ शर्मा विरसायर ग्रामक निवासी रहथि आ 1930-35 ई. मे लहेरियासरायक नौर्थब्रुक हाइस्कूलमे संस्कृतक अध्यापक रहथि। हुनक ई निबन्ध मूल रूपसँ एना अछि-
भाद्रशुक्लचतुर्थ्यां चन्द्रदर्शनं द्रष्टुर्मिथ्याभिशापजनकम् ततो वर्जनीयम् तथा च मार्कण्डेयः-
सिंहादित्ये शुक्लपक्षे चतुर्थ्यां चन्द्रदर्शनम्।
मिथ्याभिशापं कुरुते तस्मात् पश्येन्न तं सदा।
तदेति- चतुर्थ्यामित्यर्थः।
इयं चतुर्थी चन्द्रोदयव्यापिनी ग्राह्या।
कर्मणो यस्य यः कालस्तत्कालव्यापिनी तिथिः।
इति वचनात्। उभयदिने चन्द्रोदयव्याप्तौ पञ्चमीयुतैव ग्राह्या।
मुन्यग्निक्रतुभूतानि षड्मुन्योर्वसुरन्ध्रयोः।
इत्यादिनिगमात्।
तेन तृतीयायामुदितस्य चन्द्रस्य चतुर्थ्यां दर्शने चतुर्थ्यामुदितस्य पञ्चम्यां दर्शने च न दोषः। पूर्वदिने चतुर्थ्यामुदितस्य चतुर्थ्यामपि दर्शने दोषाभाव एवं, उभयदिनव्याप्तौ पूर्वदिनैकादश्यामन्नाद्याहारवत्। चतुर्थ्यामुदितस्य तु चतुर्थ्यां प्रमादाद् दर्शने स्यमन्तकोपाख्यानस्मरणेन तदन्तर्गतधात्रेयिकामात्रपाठेन वा तद्दोषशान्तिः। तदुक्तं ब्रह्मपुराणे-
नारायणोऽभिशप्तस्तु निशाकरमरीचिषु।
स्थितश्चतुर्थ्यामद्यापि मनुष्यानारतेच्च सः।।
अतश्चतुर्थ्यां चन्द्रन्तु प्रमादाद् वीक्ष्य मानवः।
पठेद् धात्रेयिकावाक्यं प्राङ्मुखो वाप्युदङ्मुखः।।
नारायणः श्रीकृष्णः। अभिशप्तः मिथ्यापरीवादाभिभूतः।
सः अभिशापः। धात्रेयिकावाक्यं तु-
सिंहः प्रसेनमवधीत् सिंहो जाम्बवता हतः।
सुकुमारक मा रोदीस्तव ह्येष स्यमन्तकः।।
इति स्यमन्तकोपाख्यानस्मरणेन चतुर्थीचन्द्रदर्शनदोषक्षालनं विष्णुपुराणे तदुपाख्यानान्त एवोक्तम्। तद् यथा-
इत्येतद् भगवतो मिथ्याभिशस्तिक्षालनं यः स्मरति न तस्य कदाचिदल्पापि मिथ्याभिशस्तिर्भवति, अहताखिलेन्द्रियश्चाखिलपापमोक्षमवाप्नोति। इति
पूर्वोक्तधात्रेयिकावाक्यपाठोऽप्येतदुपाख्यानस्मरणार्थं एवं मिथिलायां शिष्टजनपरिगृहीतलोकाचारनुमोदितभाद्रशुक्लचतुर्थीचन्द्रपूजने धात्रेयिकावाक्येन चन्द्रदर्शनं कृत्वा स्यमन्तकोपाख्यानञ्च श्रूयते।
यद्यपि पूर्वोक्तब्रह्मपुराणवचनात् स्कन्दपुराणोक्तस्यमन्तकोपाख्यानाच्च भगवतो गणेशस्य शापेन सर्वमासीय शुक्लचतुर्थीचन्द्रस्य दर्शनानर्हता तस्यैव च शापानुग्रहेण द्वितीयासु तद्दर्शनोत्तरं चतुर्थीषु तद्दर्शनदोषाभावश्च प्रतीयते तथापि पूर्वोक्तमार्कण्डेयवचनात् ब्रह्मपुराणवचनाच्च भाद्रशुक्लचतुर्थ्यां धात्रेयिकावाक्यपाठमन्तरेण चन्द्रदर्शनं नोचितमितियवसेयम्।।

(ध्यातव्य जे 1934 ई. में दरभंगामे धर्मशास्त्रीय निर्णयक लेल एकटा विशाल परिषदक गठन भेल छल। ओ विद्वान् लोकनि भरि सालक पाबनि-तिहार पर 83 टा विस्तृत निबन्ध लिखलनि। एक विद्वान् के एक विषय पर निबन्ध लीखि अपन निर्णय देबाक आग्रह कएल गेल छल। ओहिमे सँ किछु विद्वान् दू-तीन विषय पर अपन निर्णय देल, मुदा अधिकांश विद्वान् एक एक विषय पर लिखलनि। एकर सम्पादक छलाह कुशेश्वर कुमर शर्मा, आ 16 विद्वानक समिति एहि सभ निबन्धक पुनरीक्षण कएलनि। एहिमे विशेष रूपसँ महावैयाकरण दीनबन्धु झाक सहयोग रहलनि। ई ग्रन्थ बहुत दिन धरि अप्रकाशिते रहल। 1985 ई. में पं. गोविन्द झाक अथक परिश्रमसँ तिरहुतामे लिखल सभटा निबन्ध देवनागरीमे उतारल गेल आ ओकर प्रकाशक भेलाह नगेन्द्र कुमार शर्मा। एहि ग्रन्थ पर भूमिका लिखलनि भारतक प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति पी. एन. भगवती। मिथिला मे एहि ग्रन्थ कें धर्मशास्त्रीय निर्णयक लेल प्रामाणिक मानल गेल। आब तँ ई अनुपलब्ध भए गेल अछि।)
स्यमन्तक मणिक कथा एहि प्रकारें अछि- कृष्ण दखनि द्वारकाक राज रहथि तँ सत्राजित् नामक एकटा सामन्त सूर्यक उपासना कए एकटा एहन मणि प्राप्त कएल जाहिसँ आठ भार सोना बनैत छल। एक बेर वार्ताक प्रसंगमे कृष्ण सत्राजित् सँ ओ स्यमन्तक मणि माँगि लेलनि मुदा सत्राजित् ओ मणि कृष्ण कें नहिं दए अपन सोदर भाए प्रसेनदित् कें देल। प्रसेनजित् ओ लए एक दिन वनमे शिकार खेलाए गेलाह जतए हुनका सिंह मारि देलक। जखनि प्रसेनजित् बहुत दिन धरि नहिं घुरलाह तँ सत्राजित् प्रजामे दुष्प्रचार करए लगलाह जे कृष्ण हमर भाए कें मारि स्यमन्तक मणि चोरा लेलनि। ई मिष्या कलंक कृष्ण पर लागि गेल। एकर परिमार्जनक लेल कृष्ण अपन सेनाक संग वन गेलाह तँ ओतए स्पष्ट भए गेलनि जे प्रसेनजित् कें सिंह मारलक आ ओहि सिंहकें जाम्बवान् मारल। कृष्ण जाम्बवानक गुफा धरि पहुँचलाह तँ ओतए जाम्बवती कें ओहि मणि सँ खेलाइत देखलनि। एकर बाद जाम्बवानक संग कृष्णक युद्ध आरम्भ भएल। कतोक दिन बीति गेल तखनि केओ कमजोर नहिं पडलाह तखनि जाम्बवान् के स्मरण भेलनि जे त्रेतामे रामचन्द्र जे अपन अवतारक प्रसंग कहने रहथि से यैह कृष्ण थिकाह। तखनि जाम्बवान् युद्ध करब छोडि अपन पुत्री जाम्बवतीक संग कृष्णक विवाह कराओल आ स्यमन्तक मणि कृष्ण के देल। ई प्रसंग बूझि सत्राजित् सेहो लज्जित भेलाह आ अपन पुत्रीक संग श्रीकृष्णक विवाह कराए देल आ श्रीकृष्ण मिथ्या कलंक सँ मुक्त भेलाह।


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