जय मिथिला

मिथिलाक लिपि, इतिहास, कला एवं संस्कृति पर शोधपूर्ण विमर्श

मुख्य आलेख

अन्धराठाढीसँ एखनि धरि प्राप्त तीन अभिलेख

[दिनांक 16 एवं 17 मार्च, 2018 कें अन्धराठाढी में वाचस्पति-महोत्सव मनाओल गेल। एहि अवसर पर दिनांक 17 मार्च कें डा. फणीकान्त मिश्रक अध्यक्षतामे इतिहास एवं पुरातत्त्व सत्र मे पढल गेल आलेख]

 

सिमरौनगढ़ से प्राप्त नवीन खण्डित शिलालेख

दिनांक 15 मई, 2018 ई.को सोसल मीडिया फेसबुक के माध्यम से श्री डी. के. सिंह से सूचना दी कि सिमरौन गढ कोल्डस्टोर से पश्चिम स्थित तालाब की खुदाई के दौरान एक शिलालेख का टुकडा मिला है। उन्होंने इसी पोस्ट के माध्यम से लोगों से इसे पढने का भी आग्रह किया। यह अभिलेख तीन ओर से खण्डित है, केवल नीचे का भाग सुरक्षित है। इस खण्डित शिलालेख की लंबाई एवं चौड़ाई क्रमशः 29.5 से.मी. तथा 15 से.मी.है।>>

 

 

मिथिला नगरीक स्थान निर्धारण- ज्योतिष शास्त्रक प्रमाण

 

ज्योतिष शात्रक परम्परामे मिथिलाक लेल 6 आंगुर पलभाक निर्धारण कएल गेल अछि जाहिसँ अक्षांशक निर्धारण होइत छैक आ ओही अक्षांशक आधार पर सम्पूर्ण मिथिलाक लेल मानक गणना कएल जेबाक परम्परा छैक। ई स्थान निश्चित रूपसँ ओएह मिथिला नगरी छल जे प्राचीन कालमे राजधानी रहए। तें ज्योतिष शास्त्रक आधार पर मिथिला नगरीक स्थान निर्धार करब एकटा निर्दुष्ट प्रमाण थीक>>

 

 

Ghanto-puja

मिथिलामे विलुप्त भेल जाइत पाबनि- घाँटो-पूजा

लगभग 2010 ई. धरि ई पूजा होइत हम देखने छी। एहिमे डमरूक आकारक माँटिक सात आकृति बनाए भरि वैशाख पूजा कएल जाइत छल। भाँटि आ बँगलाहीक फूल एहि पर चढाओल जाइत छल। हम माँक आदेश सँ बड़ आस्थासँ ई फूल तोडि अनैत रही से मोन अछि। मिथिलामे मेष संक्रान्तिसँ एक दिन पूर्व मासान्तक दिन एहि सातो आकृतिक स्थापना गोसाउनिक सीर पर कएल जाइत अछि। आ पुनः अगिला मासान्त कें विसर्जन होइत अछि। >>

 

 

Ramanavami Puja Paddhati

रामनवमीपूजा विधि मिथिलाक परम्परामे उक्त आगम-पद्धतिसँ

(एहि पद्धतिक दू टा पाण्डुलिपि हमरा लग उपलब्ध अछि। एकटामे संक्षिप्त पद्धति देल छैक आ दोसरमे कथाक संग विस्तृत पद्धति अछि। ई दूनू टा पद्धति महावीर मन्दिरसँ प. भवनाथ झाक संपादनमे प्रकाशित अगस्त्य-संहिताक परिशिष्टमे प्रकाशित अछि। पाण्डुलिपिक विवरण आदि ओहि पुस्तकमे विस्तारसँ देल गेल छैक। एही प्रकाशनक आधार पर मैथिल साम्प्रदायिक रामनवमीक पूजा पद्धति एतए देल जा रहल अछि। ई मूल पद्धति संस्कृतमे छैक, मुदा मन्त्रक अतिरिक्त जे कोनो निर्देश वाक्य संस्कृतमे छल तकरा मैथिलीमे अनुवाद कए एतए देल जा रहल अछि जाहिसँ पूजा केनिहार वा करौनिहारकें सुविधा हो>>

 

Buddha Idol at Bideshavara Sthan

मिथिलामे बुद्ध-पूजाक परम्परा

मिथिलामे भलें महान् दार्शनिक उदयनाचार्यकें बौद्धमतक खण्डन करबाक श्रेय देल जाइत हो आ कहल जाइत हो जे ओ बौद्धकें निर्मूल कएलनि। आ एहि सम्बन्धमे अनेक खिस्सा-पिहानी गढि दूनू मतक बीच शास्त्र-चिन्तनकें भयंकर युद्ध आ शत्रुताक रूपमे प्रचारित कएल जाइत हो मुदा सत्य इएह अछि जे समाज बुद्धकें अपन आराध्यक रूपमे मानैत रहल। हमरालोकनिकें ई बुझबाक चाही जे दर्शनशास्त्रक दू मतक बीच जतए कतहु शास्त्रार्थ भेल हो ओ सभटा तत्त्वक अन्वेषणक लेल होइत रहल। आ जिनका ने शास्त्रसँ मतलब रहनि आ ने कोनो मतक ज्ञान रहनि ओ सामान्य लोक एहेन शास्त्रार्थकें दू टा राजाक बीच लड़ाइके रूपमे शत्रुता-मैत्रीक गणना करैत रहलाह।

 

 

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जुड़ शीतल पाबनि

मिथिलामे मेष संक्रान्तिक अगिला दिन जूड़ शीतल पावनि मनाओल जाइत अछि। ई प्रत्येक वर्ष 14-15 अप्रैल कें होइत अछि। एहिमे निम्नलिखित महत्त्वपूर्ण कार्य कार्य होइत छैक। ई दू दिनक पाबनि थीक। पहिल दिन संक्रान्तिक कृत्य होइत अछि जकरा सतुआइन कहल जाइत छैक आ दोसर दिन बासि-पावनि होइत अछि।

 

variations in Mithilakshar

मिथिलाक्षरक मानकीकरणमे समस्या आ समाधानक दिशा

हमरालोकनि देखि चुकल छी जे 10म शतीसँ 19म शती क पूर्वार्द्ध धरि मिथिलाक्षरक स्वरूप अपरिवर्तित रहल अछि। केवल द अक्षरमे विशेष परिवर्तन भेल जे नागरीक समान रूप छोडि़ लगभग 15म शतीमे अपन वर्तमान स्वरूपमे आबि गेल। भ अक्षर 12म शतीक लगपासमे अपन वर्तमान स्वरूपमे आबि गेल। शेष अक्षर आ संयुक्त करबाक विधि 10म शतीसँ आइ धरि समाने रहल अछि। आइ मानकीकरणक पहिल समस्या अछि जे 1850 ई.क बाद मिथिलाक्षरक जे स्वरूप हमरालोकनि पबैत छी ओकरा मानक मानल जाये अथवा 10म शती सँ 1850 धरि जे अपन मौलिक स्वरूप अछि तकरा मानक मानल जाये? >>आगाँ पढू >>

Ramacharitamanas by Sadal Mishra

रामचरितमानस के प्रथम संस्करण की विशेषता

पं. सदल मिश्र का सम्पादन, सुन्दरकाण्ड के सन्दर्भ में दिग्दर्शन- महावीर मन्दिर की पत्रिका धर्मायण की अंक संख्या 88, अक्टूबर-मार्च, 2015 में प्रकाशित) बहुत कम पाठकों को यह विदित है कि गोस्वामी तुलसीदास रचित रामचरितमानस के प्रथम सम्पादक, हिन्दी के आदि गद्यकार, पं. सदल मिश्र थे। उनके द्वारा सम्पादित यह ग्रन्थ कलकत्ता से 1810 ई. में प्रकाशित हुआ था। यह एक हस्तलिखित प्रकाशन था, जिसमें लीथो प्रिंटिंग की तकनीक अपनायी गयी थी। बहुत कम संख्या में छपाई के कारण कम समय में ही यह अनुपलब्ध हो गया >>आगाँ पढू >

Chaturthchandra Puja in Mithila

मिथिलाक चौरचन पूजा- चतुर्थीचन्द्रपूजा

(ई पूजा कहियासँ आरम्भ भेल आ कोन दिन होइत अछि, एकर की कथा अछि से देखबाक लेल एतए दबाउ)

चतुर्थीचन्द्रपूजाविधि- भाद्र शुक्ल चतुर्थी तिथि कें व्रत-उपवास कए सन्ध्याकाल स्त्री अथवा पुरुष पूजा करथि। तेकुशा, तिल एवं जल लए- नमोऽस्यां रात्रौ भाद्रे मासि शुक्ले पक्षे चतुर्थ्यां तिथौ अमुकगोत्रायाः मम अमुकीदेव्याः सकलकल्याणोत्पत्तिपूर्वकधनधान्यसमृद्धिसकलमनोरथसिद्ध्यर्थं यथाशक्तिगन्धपुष्प-धूप-दीप-ताम्बूल-यज्ञोपवीत-वस्त्र-नानाविध-नैवेद्यादिभिः रोहिणीसहित-भाद्र- शुक्ल-चतुर्थीचन्द्र-पूजनमहं करिष्ये।। (एतए महिलाक द्वारा कएल गेल पूजाक मन्त्र देल अछि। यज्ञोपवीतधारी नमो के स्थानमे ओंकारक उच्चारण करथि

maithili in 1802

1802 ई. मे मैथिलीक वैधानिक उल्लेख

1803 ई.मे मिथिलाक तिरहुत जिला आ ओकर लगपासक आरो जिलामे बाजल जाएवला भाषा मैथिलीकें भाषा कहल गेल अछि आ ओकर लिपिक उल्लेख सेहो भेल अछि। एतय भोजपुरी, मगही अथवा आन कोनो नव प्रचारित भाषाक कोनो चर्चा धरि नहिं अछि। ओहिकाल धरि मैथिलीमे कोनो प्रकारक दस्तावेज नै लिखल जाइत छल आ ने कोनो कविक रचना उपलब्ध भए प्रकाशित भेल रहैक तें ओकर ओतेक विस्तृत चर्चा नै भएल अछि। मुदा ओकरा एकटा स्वतन्त्र भाषा मानल गेल छैक आ एहि उल्लेखमे एक ठाम भाषा आ दोसर ठाम बोली शब्दक व्यवहार भेल अछि।
मूल पढवाक लेल एतए जाउ>>

History of Mithila

तिरहुत रिपोर्ट, वाल्टर हेमिल्टन, 1820 ई.

1820 ई. में वाल्टर हैमिल्टन लिखैत छथि जे प्राचीन मिथिला 1820 ई.क तिरहुत, पूर्णिया आ सारन ई तीनू जिला धरि व्याप्त अछि।
ओ एकटा आर महत्त्वपूर्ण गप्प लिखैत छथि जे 1811 ई. में लार्ड मिण्टोक शासनकालमे एकटा हिन्दू कालेजक स्थापनाक निर्णय भेल छल। एकरा लेल भौरागढी चुनल गेल रहए। निश्चित रूपसँ ओहि कालमे दरभंगाक राजा अपन छोडल राजमहल एहि लेल देबाक प्रस्ताव देने छल होएताह। ई हिन्दू कालेज नदियाक समकक्ष बनएबाक योजना छल जाहि लेल 100 रुपयो मासिक वेतन पर दू अध्यापक आ 60 रुपया मासिक वेतन पर 10 टा सह-अध्यापकक नियुक्तिक लेल सभटा योजना बनि आधुनिक भाषा मे विस्तृत परियोजना प्रतिवेदन कुल 12,472 रुपयाक बनि चुलक छल।
मुदा नै जानि की भेलैक।
आगाँ पढू वाल्टर हेमिल्टनक विस्तृत रिपोर्ट>>

Valmiki

वाल्मीकि-रामायणमे गणित आ फलित ज्योतिषक विचार

भारतक इतिहासमे ई परम सत्य अछि जे यूरोपियन इतिहासकार लोकनि भारतक प्राचीन साहित्यक इतिहास के निर्णय करबामे न्याय नै कएने छथि। भारतमे मोहन जोदडोक खुदाइ भेलाक बाद ओकर जे कार्बन डेटिंग 1400 ई.पूर्व भेल ओकरा आधार पर वैदिक आ पौराणिक साहित्यक इतिहास लिखल गेल। जें कि सिन्धु घाटी सभ्यताक बादे वेदक रचना मानल जाए लागल आ आर्य कें सिन्धु घाटीक सभ्यताक विध्वंसक आ बाहरसँ एनिहार आक्रान्ता मानबाक खिस्सा गढल गेल तें समस्त भारतीय साहित्यक पूर्वसीमा 1400 ईसापूर्व मानि लेल गेल। Read more>>

Mahishasuramardini yantra

तन्त्र-साधकों के लिए सन्दर्भ ग्रन्थ- कौलोपनिषद्

तन्त्रशास्त्र वेदों का ही विस्तार है। इसके सिद्धान्त दार्शनिक सिद्धान्तों का एक अनुप्रयोग है, जिनका आलम्बन कर कोई साधक चरम-सुख की गहराइयोंमे उतर जाता है। तन्त्रशास्त्र की इस धारा का सुन्दर विवेचन कौलोपनिषद् में हुआ है। इसमें साधकों के लिए दिशा-निर्देश किये हैं। यहाँ हिन्दी अनुवाद के साथ यह प्रस्तुत है।Read more>>

hanumanji

काँधे मूज जनेऊ साजै

वर्तमान में सबसे अधिक पाठ किया जानेवाला साहित्य है- हनुमान-चालीसा। यह गोस्वामी तुलसीदास की रचना मानी जाती जाती है। इसमें काँधे मूँज जनेऊ साजै पाठ संगत नहीं है, क्योंकि मूँज की मेखला होती है और उसे कमर में बाँधा जाता है। यह ब्रह्मचर्य का प्रतीक है। हनुमानजी बालब्रह्मचारी है, रुद्रावतार है। उनका जनेऊ मूँज का नहीं हो सकता। दरअसर बाँधे मूँज, जनेऊ साजै पाठ होना चाहिए Read more>>

Sarasvati-puja

मैथिल साम्प्रदायिक सरस्वती-पूजा पद्धति

मिथिलामे तान्त्रिक विधि-विधानसँ कर्मकाण्ड होइत अछि। सरस्वती-पूजाक पद्धति महाराजाधिराज रमेश्वर सिंहक उपयोग करबाक लेल गंगौली गामक म.म. जगद्धर झा पद्धति बनौने रहथि। संगहि लोहना गामक प. रमाकान्त ठाकुर सेहो महाराजाधिराज रमेश्वर सिंहक आज्ञासँ पौरोहित्यकर्मसारक रचना कएल। ओहिमे सरस्वती-पूजाक विस्तृत पद्धति देल अछि>>

dipavali

दीपावली का माहात्म्य

दीपावली सम्पूर्ण भारतवर्ष में श्रद्धा एवं विश्वास के साथ मनाया जानेवाला प्रमुख पर्व है। इस दिन के साथ कई कथाएँ एवं ऐतिहासिक घटनाएं जुडी हुई है।

Ulka in Dipavali

मिथिलामे दीपावलीक राति ऊक फेरबाक परम्परा

तीन प्रकारक जे रात्रि कालरात्रि, महारात्रि आ मोहरात्रि कहल गेल अछि ताहि में पहिल कालरात्रि दीपावली थिक। मिथिलामे ई गृहस्थक लेल महत्त्वपूर्ण अछि। आई जखनि बहुत मैथिल बन्धु बाहर रहैत छथि, बहुतो गोटे परम्परा सँ अनभिज्ञ छथि तखनि हुनका लोकनिक लेल एतए हम मिथिलाक परम्पराक उल्लेख करैत छी। परदेसमे एकर निर्वाह तँ कठिन अछि मुदा जानकारी अधलाह नहिं। बहुत विधि छैक जे कएल जा सकैत अछि।

manuscript

A Text From Rudrayamala as the Source of the History of Mithila

I have a manuscript dealing with the history of Mithila. I have found it in scattered position with some another old papers and a manuscript in Devanagari, beside the road at Ladora village near Kalyanpur block headquarters in Samastipur district in 2013 while I was on the way to Ajit Kumar Mehta Sanskrit Shikshan Samsthan, a Sanskrit college affiliated to Rastriya Sanskrit Sansthan, Delhi. >>

सामा-चकेबाक कथा

सामा-चकेबाक सम्पूर्ण कथा कतहु ने तँ पुराण मे भेटैत अछि आ ने लोककथे मे। एकर मूलस्रोत भविष्य-पुराणक सूर्योपासनाक प्रसंग में अछि, मुदा मिथिलामें प्रचलित बहुत रास विधिक आलोकमे ओकर व्याख्या नहिं भए पबैत छैक, तें बुझाइत अछि जे कतहु ने कतहु ओ अंश छुटल अछि जे पारम्परिक विधि-विधानकें कथाक संग जोडैत हो। >>

Dhanvantari

धन्वन्तरि-जयन्ती या धनतेरस?

समुद्र-मन्थन के क्रम में दीपावली से एक दिन पूर्व अमृत कलश के साथ भगवान् धन्वन्तरि महाराज उत्पन्न हुए थे। वे शारीरिक रोगों का निवारण करनेवाले देवता माने गये हैं। इस दिन उनकी जयन्ती की परम्परा भारत में प्रचलित है। आज बाजारवाद ने संचारमाध्यमों के द्वारा इसे खरीद-बिक्री का दिन बना दिया है और उसे धन के साथ जोड़ दिया है >>