जय मिथिला

मिथिलाक लिपि, इतिहास, कला एवं संस्कृति पर शोधपूर्ण विमर्श

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जुड़ शीतल पाबनि


मिथिलामे मेष संक्रान्तिक अगिला दिन जूड़ शीतल पावनि मनाओल जाइत अछि। ई प्रत्येक वर्ष 14-15 अप्रैल कें होइत अछि। एहिमे निम्नलिखित महत्त्वपूर्ण कार्य कार्य होइत छैक। ई दू दिनक पाबनि थीक। पहिल दिन संक्रान्तिक कृत्य होइत अछि जकरा सतुआइन कहल जाइत छैक आ दोसर दिन बासि-पावनि होइत अछि।

पहिल दिनक कृत्य-

गोसाउनिक पूजा
घैल, सत्तू आदि दान करब
गोसाउनिक सीर पर लोटामे जल आ सेमार भरि कए राखब।
पुरैनिक पात पर सतुआ आ गुड खाएब
मसुरीक घाठि आ नीमक पात पीसि जलमे घोरि पीयब- एकर उल्लेख शास्त्रमे तँ भेटैत अछि मुदा हमर देखल-सुनल नै अछि। सम्भव थीक जे आब ई व्यवहारमे नै हो। केवल नीमक पात खेबाक चलनि हम देखने छी।

दोसर दिन

घरक वृद्ध व्यक्तिक हाथें चानि पर सेमार आ बासि पानि ग्रहण करब अर्थात् जुड़ाएब- पहिल दिन गोसाउनिक सीर पर सेमार आ जल भरल लोटा जे राखल जाइत अछि ओकरे पानि चुरुकमे लए घरक वृद्ध महिला सभक चानि पर ओ जल भोरमे दैत छथिन्ह।
गाछ-वृक्षकें पटाएब- कहल जाइत अछि जे एहिसँ पितर तृप्त होइत छथि। तें गाछ-वृक्षकें जुड़एबाक ई विधान कएल गेल अछि।
घरक चूल्हि मे सेहो बासि भात आ बडी पुरैनिक पात पर राखि चढाओल जाइत अछि आ ओहि दिन चूल्हि नै पजरैत अछि।
बासि भात, दलिपूड़ी आ बड़ी खाएब- पहिलुक दिनक राखल दलिपूड़ी, बासि भात, बड़ीक झोर, दही आदि एहि दिनक भोजन होइत अछि। चूल्हि नै पजरैत अछि।
एक-दोसरा पर पानि, थाल आ कादो देब आ पोखरिमे पैसि खेल करब- ई सामाजिक महत्त्वक खेल थीक। हमरा स्वयं देखल अछि जे हमरालोकनि गामक सभलोक एक संग अपन गामक सीमामे छोट-छोट पोखरिमे पैसि हेलैत रही। एहि क्रममे पोखरिक पानि टुटैत छल आ सभटा थाल-कादो, केचली, सेमार आगि गंदगी साफ भए जाइत छल। जाहि पोखरिमे मखान लगाओल रहैत छल अथवा पुरैनिक पात रहैत छल ओहिमे खेल नै होइत छलैक।
एहि दिन अपन गामक सीमा पर घुमबाक परम्परा छलैक। आन गामक लोक दोसर गामक पोखरिसँ पानि नै भरि सकैत छल। एकर गामक बेइज्जती बूझल जाइत छलैक। हमरा देखल अछि जे दोसर गामक लोक अपन सीमावर्ती गामक सीमामे पैसि पोखरिसँ पानि भरि लैत रहथि आ ओहि पर बनाबटी झगडा आ बनाबटी मारि-पीट सेहो होइत छल। लाठी चलएबाक शक्ति-प्रदर्शन, ढेपा फेकि आन गामक लोक कें रोकबाक प्रदर्शन, ढेलमाउस चलाएबाक प्रदर्शन आदि होइत छल।
हमरा देखल अछि जे सभकेओ थाल-कादोसँ लेपटाएल, भीजल कपड़ा पहिरने एक संगें गामक मन्दिर पर बैसि भजन-कीर्तन करैत रही। लगभग भरि दोपहरिया एही थाल-कादोसँ सनल रहैत रही। घर घुरबाक काल कोनो स्वच्छ पानि बला पोखरिमे नीक जकाँ स्नान कए अपन घर पर अबैत रही।
सुनल अछि जे ब्रिटिश शासन कालमे एक-दोसर जमीनदारक हँसेरी आपसमे मारि-पीट सेहो कए लैत छल। ओना तँ ई खेल रहैक, मुदा कोनो कोनो बेर दुर्घटनावश लोक घायल सेहो होइत छल आ जोनो चल जाइत रहैक।
साँझमे कुश्तीक प्रदर्शन - ई अपन शौर्य-प्रदर्शनक अवसर होइत छल।

बाँसक फुचुक्का

बाँसक फुचुक्का बिना ई पावनि सुन्न लगैत अछि। चाभ बाँसक एक पोड़ काटि ओकर पेनीमे छेद कएल जाइत छैक। छेद कने फैल होएबाक चाही, किएक तँ बेसी पातर भेने गादि रहला पर फुचुक्का बेकार भए जाइत छैक। केराक सुखाएल डमपोर के राहड़ि जड़ियाठ वला डंटा पर लपेटि पातर किन्तु मजबूत डेरीसँ बान्हि पिस्टन बनैत छैक। हम नेनामे कतेक रास मे एहन फुचुक्का बनौने होएब। प्रतियोगिताक भावना रहए जे हमर फुचुक्काक पानि बेसी दूर धरि जाइत अछि। आबतँ सभटा स्मृतिशेष मात्र अछि!

बंद होएबाक कारण

एतए बंद होएबाक कारण सभ पर विचार करैत छी तँ बहुत रास तथ्य सोझाँ अबैत अछि।
खेलएबाक संगे रस्तामें उपद्रब करबाक प्रवृत्ति- हमरालोकनि खेलएबाक लेल निकलैत रही तँ समाजेक नवयुवक जोशमे रस्ताक कातक मोछाएल कटहरक गाछ कें लाठीसँ पीटि-पीटि झाडि दैक। खजूरक गाछमे लागल खजुरीक डाबा फोडि दैक। आमक टुकला झाडि दैक। ककरो दरबज्जा पर खेसारी मसुरीक ढेरीकें छहोछित कए दैक। ई सभ बात ओहि झुंडमे संग चलैत जिम्मेदार व्यक्ति कें नीक नै लगनि। रोकबाक प्रयास करथिन्ह तँ छौडा सभ माननिहार नै। एक बेर एकटा गरीब व्यक्तिक दू टा गाछ कटहर बरबाद कए देल गेलनि। पता चलल जे एहि परिवारक आयक एकमात्र ई स्रोत छलनि, जेकरा बेचि गुजर चलनि। तकर बाद हमर गाममे विवेकी आ जिम्मेदार लोक ओहि झुंडमे सम्मिलित होएबासँ कतराए लगलाह।
ताडी, दारू आ मांसक बेसी चलनि- गामक बहुत लोक पाबनि माने खाएब-पीयब आ मौज करब, ई बुझैत रहलाह। ओ सभटा दुर्व्यसन करैत अपना घरमे केन्द्रित होइत गेलाह। बहुत दिन धरि देखल जे पछिला वर्ष जे संगे निकलल रहथि, आ अगिला बेर कहलनि जे हम नै निकलब, घरे पर खेला लेलहुँ। बहुत बहाना, एते धरि जे ज्वर हेबाक सेहो बहाना।
श्री लालू प्रसादजीक कालमे राजनीति- एहि कालमे आर जे भेल हो, समाजमे सवर्ण आ सवर्णेतरक बीच दूरी बढि गेल, जे गाम एक छल से जाति-जातिमे बँटि गेल। 1990सँ ई देखने छी जे हमरहि गाममे जाति आधारित टोली अलग अलग जुड़शीतल खेलाए लागल। सवर्ण डरक लेल घरिसँ निकललनाइ छोड़ि देलनि। कोन दल सँगे जाउ, एकरे उहापोहमे। हम 1996-97 धरि निकलैत रहलहुँ, मुदा सभखन डेराएल रही जे कतए मारि बजड़ि जाएत तकर कोनो ठेकान नै छलै।

पानिक अभाव- 1987क बाढिक बाद पानिक अभाव भए गेलैक। हमरा गामक देने जे नहरि जाइत अछि, ओहिमे आब किछुओ दिन पानि नै रहैत अछि। गामक पोखरि भरिकें लोक सभ घर बनाए लेलनि। पोखरिमे पानि अएबाक नाला बंद भए गेल। आब पोखरिक पानि ततबा विषाक्त भए चुकल अछि जे वास्तवमे ओहिमे नहाएब रोगक घर थीक। एहू कारणें खेल दिस लोकक अरुचि बढल गेल।
आ क्रमशः ई पावनि हमर गाममे समाप्त होइत गेल। जाहि गाममे एखनहुँ सामाजिक स्तर पर होइत अछि ओहि गामकें नमन!

 

धर्मशास्त्रमे उल्लेख

मिथिलाक ई महत्त्वपूर्ण पाबनि थीक। एकर सभटा विधि की तँ मिथिलाक धर्मशास्त्रसँ जुडल अछि अथवा मिथिलाक प्राकृतिक परिवेश आ सामाजिक परिवेश सँ जुडल अछि। एहिमे वीरताक प्रदर्शन सेहो होइत छल।

एहि पावनिक सम्बन्धमे मिथिलाक निबन्धकार लोकनि बेसी किछु उल्लेख नै करैत छथि।
म.म. चण्डेश्वर एहि दिनक कृत्य सभमें पहिल काज कहैत छथि जे देवताक शरीर पर जे जाड़ मास कम्बल आदि ओढाओल गेल छल तकरा अझुके दिन उतारलाक बाद देवताक पूजा करी। ओ एहि दिन छागड़क दान करबाक सेहो उल्लेख करैत छथि। एकर अतिरिक्त मसुरी आ नीमक पात एहि दिन खेबाक महत्त्वक उल्लेख करैत छथि जे ई खेलासँ भरि साल ओ व्यक्ति विषक प्रभावसँ सुरक्षित रहैत अछि। ओ एहिबात पर अपन शब्दमे जोर दैत छथि जे मसुरी पानिक संग संक्रान्तिए दिन अविकृत (टटका) पीबाक चाही, माने दोसरा दिन पीलासँ ओहिमे विकार उत्पन्न भए जाएत तें पहिले दिन पीबाक चाही।
म.म. अमृतनाथ कृत्यचिन्तामणिकें उद्धृत करैत नीमक पात आ मसुरी खेबाक बात लिखैत छथि आ संगहि सतुआ, जल भरल घैल, छाता, जूता, लोटा, आदि जल पीबाक वस्तु, आरो अनेक प्रकारक सजाओल कोहा आदि वर्तन, दाख, केरा आदि फलक दान करबाक उल्लेख करैत करैत छथि। म.म. अमृतनाथ तिथितत्त्व नामक ग्रन्थकें उद्धृत करैत सतुआ आ जल भरल घैल दान करबाक बात लिखैत छथि।

वर्जित काज

एहि संक्रान्ति दिन कोनकोन वस्तु नै खेबाक चाही आ कोन काज नै करबाक चाही तकर उल्लेख करैत म.म. अमृतनाथ कहैत छथि जे- काँसाक बरतनमे भोजन नै करी। मांस नै खेबाक चाही। मसुरी नै खाइ। बदाम कोदो, साग, मधु (माने मदिरा) दोसराक घरक अन्न, दोसर बेर भोजन आ मैथुनक त्याग करी।
एतए संदेह हैत जे ऊपर मसुरी पीबाक बात कहल जाकुल अछि आ एतए मना कएल गेल अछि तखनि की करी। एकर उत्तर ई जे नीमक पात संग मसुरीक घाठि पीबाक बात ऊपर आएल अछि। ओकर अतिरिक्त भोजनमे मसुरी दालिक व्यवहार नै करी।

म.म. अमृतनाथक कृत्यसारसमुच्चयक संपादक पं. गंगाधर झा अपन टिप्पणीमे वैशाख मास इनार, पोखरि खुनाएब, ओकर सफाइ करब, पोखरिक घाटक सफाइ करब आदिक महत्त्व लिखैत छथि।

मिथिलाक प्रख्यात ज्योतिषी पं. सीताराम झा अपन पुस्तक पर्वनिर्णयमे एकटा नव बात लिखैत छथि जे तन्त्रशास्त्रक परम्परामे मेष संक्रान्तिक नाम चाण्डाल संक्रान्ति थीक। एकर प्रातसँ नववर्ष आरम्भ होइत अछि। एहि नववर्षक उपल्क्ष्यमे चाण्डालक स्पर्श, क्रीडा, तथा भगवतीक प्रसादक रूपमे मद्यपान करब तन्त्रक परम्परामे कहल गेल अछि। किन्तु ब्राह्मण क्षत्रिय आ वैश्यक लेल मद्यपान शास्त्रमे मना केल गेल अछि। तें मद्यपानक स्थान पर बासि-भात खाए तन्त्रक परम्पराक निर्बाह करैत छी। कारण जे बासि भात धर्मशात्रमे मदिराक समान कहल गेल अछि मुदा पुरैनिक पात पर राखि देलासँ अन्नक विकार नष्ट भए जाइत छैक।

एहि प्रकारें हमरालोकनि देखैत छी जे जूडशीतल पाबनिक विशाल आयाम अछि। एहिमे एक संग धर्मशास्त्रक पालन आ सामाजिक सद्भावक सुरक्षा, जलसंरक्षणक लेल पोखरि, इनार आदि सफाइ आदिक काज कए एहि पाबनि कें पूर्ण बनबैत छी।

मुदा खेदक विषय अछि जे लगभग 30 वर्षसँ एहि अवसर पर सामाजिक सद्भाव घटल अछि। लोक अपन-अपन घरमे केन्द्रित भए जाइत छथि आ एक संग मीलि थाल-कादो खेलेबाक चलन घटि गेल अछि। बीचमे दारू, मांस एहि पाबनिक मुख्य अंग बनि गेल। गामसँ बाहर रहनिहार लोककें थाल-कादो छुअब इन्फेक्शन के नोंतब बुझाए लगलनि। पोखरिमे पानिक मात्रा घटि जाएब सेहो एकर कारण भेल अछि। फलतः ई पर्व आब समाप्ति पर अछि।