जय मिथिला

मिथिलाक लिपि, इतिहास, कला एवं संस्कृति पर शोधपूर्ण विमर्श

Mahishasuramardini Tantra

कौलोपनिषत् ।।

।। श्रीः ।।

।। अथ कौलोपनिषत् ।।

[तन्त्र का नाम सुनते ही आज लोग उसे घृणा की दृष्टि से देखने लगते हैं। किन्तु इनके सन्दर्भ ग्रन्थ शास्त्र की दृष्टि से कितने गम्भीर हैं और उनमें किस प्रकार से तान्त्रिकों के लिए नैतिकता और कठोर नियमों का महत्त्व दिया गया है, इसे देखने के बाद हम इस परम्परा के महत्त्व को समझ पाते हैं। तन्त्रशास्त्र के सन्दर्भ-ग्रन्थों में कौलोपनिषद् का महत्त्वपूर्ण स्थान है। यहाँ हम हिन्दी अनुवाद के साथ इसे प्रस्तुत कर रहे हैं।

इसी ग्रन्थ पर भारत के सुप्रसिद्ध तन्त्रशास्त्री भास्करराय की टीका भी उपलब्ध है। इस टीका की व्याख्या तन्त्र की कौलिक शाखा को समझने में महत्त्वपूर्ण है। अगले आलेखमे हम भास्करराय कृत संस्कृत व्याख्या का हिन्दी अनुवाद प्रस्तुत करेंगे।]

शन्नः कौलिकः शन्नो वारुणी शन्नः शुद्धिः शन्नो। अग्निश्शन्नः सर्वं समभवत् ।
कौलमार्ग के प्रवर्तक शिव हमारा कल्याण करें। वरुण की शक्ति, शुद्धि, अग्नि एवं सभी हमारा कल्याण करें।

नमो ब्रह्मणे नमः पृथिव्यै नमोऽद्भ्यो नमोऽग्नये नमो वायवे नमो गुरुभ्यः।
ब्रह्मा को प्रणाम। पृथ्वी को प्रणाम। जल को प्रणाम। अग्नि को प्रणाम। वायुको प्रणाम, गुरुओं को प्रणाम।

त्वमेव प्रत्यक्षं सैवासि । त्वामेव प्रत्यक्षं तां वदिष्यामि । ऋतं वदिष्यामि । सत्यं वदिष्यामि । तन्मामवतु । तद्वक्तारमवतु । अवतु माम् । अवतु वक्तारम् । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ।
हे ब्रह्म एवं उपर्युक्त चारों प्रकार के मूलतत्त्व, आप सभी प्रत्यक्ष रूप में कौल पद्धति की वही देवी हैं। आप सब के समक्ष में उसी देवी की बात करूँगा। शाश्वत सत्य की बातें करूँगा। लौकिक सत्य की बातें करूँगा। इसलिए हमारी रक्षा करें। उस कुलदेवी की उपासना करनेवालों की रक्षा करें। मेरी रक्षा करें। उपासक की रक्षा करें। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ।

अथातो धर्म्मजिज्ञासा। योगो मोक्षः। तेषां ज्ञानस्वरूपाः। पञ्च विषयाः प्रपञ्चः। मोक्षस्सर्वात्मतासिद्धिः। ज्ञानं मोक्षैककारणम्। ज्ञानं बुद्धिश्च।

अब यहाँ से धर्म सम्बन्धी ज्ञान है। ज्ञान एवं बुद्धि दोनों पृथक् हैं और मोक्ष का एकमात्र कारण ज्ञान है। सभी वस्तुओं में एक ही आत्मा है यह जान लेना मोक्ष है।  पाँच विषय अर्थात् शब्द गन्ध स्पर्श तेज एवं शीतलता ये प्रपञ्च कहलाते हैं। सभी में आत्मा है, जो जीव से भिन्न है, यह जान लेना मोक्ष है। यही ज्ञान मोक्ष का एकमात्र कारण है।

अधर्म्मकारणाज्ञानमेव ज्ञानम् । प्रपञ्च ईश्वरः । अनित्यं नित्यम् । अज्ञानं ज्ञानम् । अधर्म्म एव धर्म्मः । एष मोक्षः।
ब्रह्म सगुण हैं, यह ज्ञान जब समाप्त हो जाये तो वहीं ज्ञान है। प्रपञ्च ईश्वर हैं। जिसे हम विनाथवान् देखते हैं उसमें ङी आत्मा स्वरूप नित्यता का ज्ञान हो। अज्ञान भी ज्ञान है। निर्गुण होना भी सगुण ही है। यही मोक्ष है।

पञ्च बन्धा ज्ञानस्वरूपाः । पिण्डाज्जननम् । तत्रैव मोक्षः । एतज्ज्ञानम् । सर्वेन्द्रियाणां नयनं प्रधानम्। धर्म्मविरुद्धाः कार्य्याः । धर्म्मविहिता न कार्य्याः । सर्वं शाम्भवीरूपम् ।

जहाँ आत्मा नहीं वहाँ आत्मा है, जहाँ आत्मा है वहाँ आत्मा नहीं, जीवों में परस्पर भेल है, ईश्वर से दीव भिन्न है तथा वह चैतन्य नहीं है ये पाँच प्रकार के ज्ञान बन्धन कहलाते हैं। इसी पाँचों के एकत्र होने पर जन्म होता है। इसी से अलग होना मोक्ष है। यही ज्ञान है। सभी इन्द्रियों को ब्रह्म तक ले जाना ही मुख्य वस्तु है। सगुण के विपरीत कार्य न करें। जहाँ गुण प्रकट हों, वैसा कार्य न करें। सभी कार्य भगवान् शिव की शक्ति शाम्भवी के रूप में है, यह जानें।

आम्नाया न विद्यन्ते। गुरुरेकः। सर्वैक्यताबुद्धिमन्ते।
कौल पद्धति के रूप में देवी को सब जानते हैं, इसलिए वेद में उनका उल्लेख नहीं है। इस पद्धति में गुरु एक ही हों। यद्यपि सभी गुरुओं के वचन एक ही हैं, किन्तु यह ज्ञान अन्त में होगा।

आमन्त्रसिद्धेः । मदादिस्त्याज्यः। प्राकट्यं न कुर्य्यात्। न कुर्य्यात्पशुसम्भाषणम्। अन्यायो न्यायः। न गणयेत्कमपि। आत्मरहस्यं न वदेत् । शिष्याय वदेत्।
मन्त्र की सिद्धि होने तक ये कर्तव्य हैं। मदमत्त करनेवाली वस्तुओं का त्याग करें। साधना के रहस्य को प्रकट न करें। जो इस मार्ग के साधक नहीं हैं उनके सामने इसकी बातें प्रकट न करें। शास्त्र की दूसरी शाखाँ भी सत्य को ही प्रकट करती हैं पर उन पर ध्यान नहीं देना चाहिए। अपना रहस्य नहीं बतलाना चाहिए। केवल शिष्य को ही बतलाना चाहिए।

अन्तः शाक्तः। बहिः शैवः। लोके वैष्णवः। अयमेवाचारः।
अन्दर से शाक्त (कौल मार्ग के उपासक) बने रहैं। शरीर पर तिलक आदि धारण करने में शैव के समान आचरण करें। सभा में वैष्णव के समान आचरण करें। यही आचार है।

आत्मज्ञानान्मोक्षः। लोकान्न निन्द्यात्। इत्यध्यात्मम्। व्रतं न चरेत्। न तिष्ठेन्नियमेन । नियमान्न मोक्शः । कौलप्रतिष्ठां न कुर्य्यात् । सर्वसमो भवेत् स मुक्तो भवति।

आत्मा का ज्ञान हो जाने पर मोक्ष होता है। लोक प्रचलित धारणाओं की निन्दा न करें। यही अध्यात्म है। धर्म, अर्थ काम एवं मोक्ष ये जो चारों पुरुषार्थ हैं, उनके लिए कार्य न करें। उनके लिए जो सिद्धान्त बने हैं, उनका पालन न करें। उन आचरणों को करने से मोक्ष नहीं मिलेगा। कौल पद्धति की बात कहीं भा सिद्ध करने का प्रयास न करें। सभी मार्ग और सभी शास्त्रों प्रति समान आचरण करें। वहीं व्यक्ति मोक्ष पाता है।

पठेदेतानि सूत्राणि प्रातरुत्थाय देशिकः।
आज्ञासिद्धिर्भवेत्तस्य इत्याज्ञा पारमेश्वरी।
यश्चाचारविहीनोऽपि यो वा पूजां न कुर्वते।
यदि ज्येष्ठं न मन्येत नन्दते नन्दने वने।
शन्नः कौलिकः। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।

जो उपासक इन सूत्रों का पाठ प्रातःकाल उठकर करता है उसकी आज्ञा विफल नहीं होती। यह परमेश्वरी देवी का आदेश है। जो आचारों से रहित हैं, जो पूजा-पाट नहीं करते हैं, किन्तु सर्वश्रेष्ठ होने का अहंकार त्याग देते हैं तो वे नन्दन वन में विचरण करते हैं।
यह कौल मार्ग हमारा कल्याण करे।

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।

 
मुख्य आलेख
hanumanji

काँधे मूज जनेऊ साजै

वर्तमान में सबसे अधिक पाठ किया जानेवाला साहित्य है- हनुमान-चालीसा। यह गोस्वामी तुलसीदास की रचना मानी जाती जाती है। इसमें काँधे मूँज जनेऊ साजै पाठ संगत नहीं है, क्योंकि मूँज की मेखला होती है और उसे कमर में बाँधा जाता है। यह ब्रह्मचर्य का प्रतीक है। हनुमानजी बालब्रह्मचारी है, रुद्रावतार है। उनका जनेऊ मूँज का नहीं हो सकता। दरअसर बाँधे मूँज, जनेऊ साजै पाठ होना चाहिए Read more>>

Sarasvati-puja

मैथिल साम्प्रदायिक सरस्वती-पूजा पद्धति

मिथिलामे तान्त्रिक विधि-विधानसँ कर्मकाण्ड होइत अछि। सरस्वती-पूजाक पद्धति महाराजाधिराज रमेश्वर सिंहक उपयोग करबाक लेल गंगौली गामक म.म. जगद्धर झा पद्धति बनौने रहथि। संगहि लोहना गामक प. रमाकान्त ठाकुर सेहो महाराजाधिराज रमेश्वर सिंहक आज्ञासँ पौरोहित्यकर्मसारक रचना कएल। ओहिमे सरस्वती-पूजाक विस्तृत पद्धति देल अछि>>

 

dipavali

दीपावली का माहात्म्य

दीपावली सम्पूर्ण भारतवर्ष में श्रद्धा एवं विश्वास के साथ मनाया जानेवाला प्रमुख पर्व है। इस दिन के साथ कई कथाएँ एवं ऐतिहासिक घटनाएं जुडी हुई है।

Ulka in Dipavali

मिथिलामे दीपावलीक राति ऊक फेरबाक परम्परा

तीन प्रकारक जे रात्रि कालरात्रि, महारात्रि आ मोहरात्रि कहल गेल अछि ताहि में पहिल कालरात्रि दीपावली थिक। मिथिलामे ई गृहस्थक लेल महत्त्वपूर्ण अछि। आई जखनि बहुत मैथिल बन्धु बाहर रहैत छथि, बहुतो गोटे परम्परा सँ अनभिज्ञ छथि तखनि हुनका लोकनिक लेल एतए हम मिथिलाक परम्पराक उल्लेख करैत छी। परदेसमे एकर निर्वाह तँ कठिन अछि मुदा जानकारी अधलाह नहिं। बहुत विधि छैक जे कएल जा सकैत अछि।

manuscript

A Text From Rudrayamala as the Source of the History of Mithila

I have a manuscript dealing with the history of Mithila. I have found it in scattered position with some another old papers and a manuscript in Devanagari, beside the road at Ladora village near Kalyanpur block headquarters in Samastipur district in 2013 while I was on the way to Ajit Kumar Mehta Sanskrit Shikshan Samsthan, a Sanskrit college affiliated to Rastriya Sanskrit Sansthan, Delhi. >>

 

सामा-चकेबाक कथा

सामा-चकेबाक सम्पूर्ण कथा कतहु ने तँ पुराण मे भेटैत अछि आ ने लोककथे मे। एकर मूलस्रोत भविष्य-पुराणक सूर्योपासनाक प्रसंग में अछि, मुदा मिथिलामें प्रचलित बहुत रास विधिक आलोकमे ओकर व्याख्या नहिं भए पबैत छैक, तें बुझाइत अछि जे कतहु ने कतहु ओ अंश छुटल अछि जे पारम्परिक विधि-विधानकें कथाक संग जोडैत हो। >>

Dhanvantari

धन्वन्तरि-जयन्ती या धनतेसर?

समुद्र-मन्थन के क्रम में दीपावली से एक दिन पूर्व अमृत कलश के साथ भगवान् धन्वन्तरि महाराज उत्पन्न हुए थे। वे शारीरिक रोगों का निवारण करनेवाले देवता माने गये हैं। इस दिन उनकी जयन्ती की परम्परा भारत में प्रचलित है। आज बाजारवाद ने संचारमाध्यमों के द्वारा इसे खरीद-बिक्री का दिन बना दिया है और उसे धन के साथ जोड़ दिया है >>