जय मिथिला

मिथिलाक लिपि, इतिहास, कला एवं संस्कृति पर शोधपूर्ण विमर्श

मिथिलामे प्रचलित सामान्य ज्योतिष आ धर्मशास्त्रक विषय

[एहिसभ विषयकें आधुनिक लोक दकियानूसी बुझैत छथि। मुदा हमरालोकनिकें बुझबाक चाही जे हमर पूर्वज एकर निर्वाह कए गेल छथि। ई हमरासभक परम्परा थीक। परम्परा ध्वस्त होएत तँ अपन अस्तित्व समाप्त होएत, इतिहास समाप्त होएत। भारतीय आ मैथिल होएबाक जे गौरव अछि ओ समाप्त होएत। हमरालोकनिक कर्तव्य थीक जे अपन भारतीयताकें जोगा कए राखी। तें एहि सभ विषय पर क्रमशः प्रकाश देल जा रहल अछि।]

छठिव्रतक संस्कृत कथा (ध्वन्यंकन, Audio)क संग

 

मिथिलामे सेहो छठि व्रतक बड़ महत्त्व अछि। एतए छठिपूजामे विधानपूर्वक कथा पढबाक सेहो परम्परा रहल अछि। कथा संस्कृतमे छैक, मुदा जँ संस्कृतमे कथा पढबाक लेल केओ इुलब्ध नहिं होथि तँ कथा छोडि देबासँ नीक थीक जे इलेक्ट्रानिक माध्यमसँ एकरा सुनल जाए। इएह सोचि एतए कर्मकाण्डक छात्रमंडलीक द्वारा पढल गेल कथा सेहो एतए प्रस्तुत अछि।>>

 

भूत आ प्रेत की थीक?

 

भूत आ प्रेतक नाम सुनैत देरी आतंक पसरि जाइत अछि। श्राद्धकर्मक विरोधीलोकनि कहि दैत अछि जे श्राद्ध प्रेत-पूजा थीक किएक तँ मृतकक नामक संग अमुकप्रेतस्य जोडल जाइत अछि. तें ई बूझब आवश्यक जे शास्त्रमे प्रेत शब्दक की अर्थ कहल गेल अछि।>>

 

दाह-संस्कार विधि

मृत्यु ध्रुवसत्य थीक। ई कखनि आ कतए भए जाएत तकर कोनो गणना नै छैक। सनातन धर्ममे मृत्युक उपरान्त दाह-संस्कारक विधान कएल गेल अछि। ओहूमे मिथिलाक अपन विशिष्ट परम्परा रहल अछि। एतए मिथिलाक परम्पराक अनुसार दाहसंस्कार विधि देल जा रहल अछि।>>

 

अथ रामनवमीपूजाविधिः। (संक्षिप्त-पूजा)

[एहि पद्धतिक पाण्डुलिपि मिथिलासँ भेटल अछि। एकर लिपि मिथिलाक्षर छैक, लिपिकार छथि बच्चू शर्मा, लिपिकाल- 1262 साल, चैत्रशुक्ल द्वितीया अर्थात् 1855 ई. होइत अछि। एकर पहिल पृष्ठक फोटो ई थीक।] ...सोना अथवा माँटिक प्रतिमा बनवा कए भोरेमे नित्यकर्म सम्पन्न कए आचमन करी। तकर बाद तामाक सराइ लए  उत्तर मुँहें ठाढ भए  सोना अथवा माँटिक प्रतिमा बनवा कए भोरेमे नित्यकर्म सम्पन्न कए आचमन करी। तकर बाद तामाक सराइ लए  उत्तर मुँहें ठाढ भए >>

हनुमानजीक धुजा गाड़बाक पूजा-पाठ

[मिथिलामे सेहो बहुत गाममे पीपरक गाछ तर हनुमानजीक ध्वजाक स्थापित होइत अछि। ई ध्वज यद्यपि कोनो शनि अथवा मंगल दिनकें स्थापित कएल जा सकैत अछि मुदा रामनवमी एवं हनुमान-जयन्तीकें स्थापित करब विशेष फलदायक होइत अछि। जँ पहिनेसँ स्थापित अछि तँ रामनवमी एवं हनुमान-जयन्ती (कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी) कें ध्वज-परिवर्तन होइत अछि। माने पुरान ध्वजक पूजा कए ओकरा विसर्जित कए पुनः नव धुजा लगैत अछि। किछु लोक अपन घरोमे ई ध्वज लगबैत छथि आ प्रतिदिन ओहि स्थानकर पूजा करैत छथि।। एकर पूजा-विधि एतए देल जा रहल अछि। यद्यपि हनुमानजीक धुजा पूजाक बहुत रास पद्धति छैक मुदा जँ मिथिलामे छी तँ ओहि ठामक पारम्परिक पूजा-पद्धति अपनाबी।

तन्त्रसाधकक लेल दैनिक कर्म

मिथिलाक परम्परामे तन्त्रक महत्त्व सर्वविदित अछि। एतय तान्त्रिकलोकनि एहि विधिसँ अपन समस्त दैनिक कर्म करैत साधना करैत छथि। पाठकलोकनिक आग्रह पर एहि ठाम तान्त्रिक विधिसँ आह्निक कृत्य देल जा रहल अछि। एतय सभसँ पहिने ई कहि देब आवश्यक जे जे केओ दीक्षा लए चुकल छी हुनके लेल ई आह्निक कर्म अछि। अदीक्षितकें एहिमे अधिकार नै अछि। तें सभसँ पहिने मिथिलाक तान्त्रिक परम्पराक अनुरूप दीक्षा लए ली।

सांस्कृतिक ह्रासक एक विषय- श्राद्धकर्मक प्रति उदासीनताक भाव

आई मिथिले टा नहिं सम्पूर्ण भारतमे हमरालोकनिक सनातन संस्कृतिक ह्रासक एकटा महत्त्वपूर्ण विन्दु अछि- पितृकर्म। माता-पिताक मृत्युक उपरान्त सभ दिन एतेक कर्म हमरालोकनिक संस्कृतिमे अछि। श्राद्ध, प्रतिवर्ष एकोद्दिष्टश्राद्ध, पार्वण, प्रतिदिन तर्पण आ विशेष रूपसँ पितृपक्षमे तर्पण, दीपावलीक दिन उल्काभ्रमण आ ब्राह्मणभोजन, गयाश्राद्ध आ अन्य पवित्र तीर्थमे श्राद्ध।.... >>

दिक्शूल आ दिग्बल

एकर विचार यात्रामे होइत अछि। दिक्शूलमे यात्राक निषेध अछि आ दिग्बल मे यात्रा नीक मानल जाइत अछि। कोन दिशामे कोन दिन गेलासँ दिक्शूल होएत आ कोन दिन दिग्बल होएत एकर विचार कएल गेल अछि। ध्यान राखी जे प्रत्येक दिशाक अपन ग्रह होइत छथि। अमरकोषमे सेहो एकर उल्लेख भेल अछि- रविः शुक्रो महीसूनुः स्वर्भानुर्भानुजो विधुः। बुधो बृहस्पतिश्चेति दिशां चैव तथा ग्रहा

कुतुप आ रोहिण कोन समय थीक?

श्राद्ध आ एकोद्दिष्टक विषयमे कुतुप कालक विचार होइत अछि। एकोद्दिष्ट आदि पितृकर्म कोन तिथिक कोन दिन होएत आ कखनि आरम्भ करबाक चाही तकर विचार करबामे कुतुप आ रोहिण नामक दू मुहूर्तक विचार कएल जाइत अछि, जकर गणना करबाक विधि एतए देल जा रहल अछि। सूर्योदयसँ सूर्यास्त धरिक समय कें 15 भागमे बाँटि देलासँ एक मुहूर्तक मान निकलैत अछि। सामान्यतः 48 मिनटक एक मुहूर्त होइत अछि, मुदा दिनमान छोट-पैघ भेलासँ हो कम-बेसी होइत अछि।

अधपहरा वा अर्द्धप्रहराक गणना केना करी?

मिथिलामे अधपहराक बड महत्त्व अछि। अर्द्धप्रहरा अर्थात् अधपहरामे कोनो शुभकाज नै कएल जाइत अछि। प्रत्येक दिन कोनो शुभ कार्य करबासँ पहिने अधपहरा देखि लेल जाइत अछि आ ओहि समय कें छाँटि कए काजक समय निकालल जाइत अछि। सामान्य जनजीवनमे एकर महत्त्व अछि आ एहन विषय थीक जकरा लेल कोनो ज्योतिषी अथवा पण्डित कें पुछबाक काज नै। किछु दिन पहिने धरि महिलालोकनि सेहो कहि दैत छलीह जे आइ शनिक शेष छियै आ बृहस्पतिक शेष छियै। संगहि आनो दिन कखनि सँ कखनि धरि अधपहरा होएत से कहि सकैत छलीह। आगाँ पढी>>

Valmiki

वाल्मीकि-रामायणमे गणित आ फलित ज्योतिषक विचार
भारतक इतिहासमे ई परम सत्य अछि जे यूरोपियन इतिहासकार लोकनि भारतक प्राचीन साहित्यक इतिहास के निर्णय करबामे न्याय नै कएने छथि। भारतमे मोहन जोदडोक खुदाइ भेलाक बाद ओकर जे कार्बन डेटिंग 1400 ई.पूर्व भेल ओकरा आधार पर वैदिक आ पौराणिक साहित्यक इतिहास लिखल गेल। जें कि सिन्धु घाटी सभ्यताक बादे वेदक रचना मानल जाए लागल आ आर्य कें सिन्धु घाटीक सभ्यताक विध्वंसक आ बाहरसँ एनिहार आक्रान्ता मानबाक खिस्सा गढल गेल तें समस्त भारतीय साहित्यक पूर्वसीमा 1400 ईसापूर्व मानि लेल गेल। Read more>>

 

 

Sarasvati-puja

मैथिल साम्प्रदायिक सरस्वती-पूजा पद्धति

मिथिलामे तान्त्रिक विधि-विधानसँ कर्मकाण्ड होइत अछि। सरस्वती-पूजाक पद्धति महाराजाधिराज रमेश्वर सिंहक उपयोग करबाक लेल गंगौली गामक म.म. जगद्धर झा पद्धति बनौने रहथि। संगहि लोहना गामक प. रमाकान्त ठाकुर सेहो महाराजाधिराज रमेश्वर सिंहक आज्ञासँ पौरोहित्यकर्मसारक रचना कएल। ओहिमे सरस्वती-पूजाक विस्तृत पद्धति देल अछि>>

 

dipavali

दीपावली का माहात्म्य

दीपावली सम्पूर्ण भारतवर्ष में श्रद्धा एवं विश्वास के साथ मनाया जानेवाला प्रमुख पर्व है। इस दिन के साथ कई कथाएँ एवं ऐतिहासिक घटनाएं जुडी हुई है।

Ulka in Dipavali

मिथिलामे दीपावलीक राति ऊक फेरबाक परम्परा

तीन प्रकारक जे रात्रि कालरात्रि, महारात्रि आ मोहरात्रि कहल गेल अछि ताहि में पहिल कालरात्रि दीपावली थिक। मिथिलामे ई गृहस्थक लेल महत्त्वपूर्ण अछि। आई जखनि बहुत मैथिल बन्धु बाहर रहैत छथि, बहुतो गोटे परम्परा सँ अनभिज्ञ छथि तखनि हुनका लोकनिक लेल एतए हम मिथिलाक परम्पराक उल्लेख करैत छी। परदेसमे एकर निर्वाह तँ कठिन अछि मुदा जानकारी अधलाह नहिं। बहुत विधि छैक जे कएल जा सकैत अछि

 

सामा-चकेबाक कथा

सामा-चकेबाक सम्पूर्ण कथा कतहु ने तँ पुराण मे भेटैत अछि आ ने लोककथे मे। एकर मूलस्रोत भविष्य-पुराणक सूर्योपासनाक प्रसंग में अछि, मुदा मिथिलामें प्रचलित बहुत रास विधिक आलोकमे ओकर व्याख्या नहिं भए पबैत छैक, तें बुझाइत अछि जे कतहु ने कतहु ओ अंश छुटल अछि जे पारम्परिक विधि-विधानकें कथाक संग जोडैत हो। >>